This video is a recording of a question-and-answer session (Ekantik Vartalaap & Darshan) with Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj. Viewers submit questions on various spiritual and religious topics, which Maharaj Ji answers, often weaving in stories and parables. The session focuses on devotional practices, overcoming life's challenges, and achieving spiritual liberation.
The power of devotion: Repeating the name "Radha Radha" is presented as a way to overcome obstacles and find joy, even amidst life's struggles. Consistent devotion is emphasized as a path to spiritual growth.
Addressing the concept of "evil eye": The speaker dismisses the idea of the "evil eye" as superstition, instead focusing on the importance of faith and devotion to God as protection.
Spiritual challenges and perseverance: The speaker explains that challenges encountered while practicing devotion are opportunities for growth and should be seen as steps towards spiritual liberation.
Differentiating between spiritual and worldly paths: The speaker clarifies the distinctions between worldly dharma (following societal norms and responsibilities) and spiritual dharma (pursuing spiritual liberation through devotion and detachment). He suggests integrating both by approaching all actions as devotion.
The nature of sin and its consequences: The speaker explains that the consequences of past sins can manifest in this life and beyond, emphasizing the importance of devotion and good conduct to purify karma and break the cycle of suffering.
Tantra and Mantra: The speaker suggests that while tantra and mantra practices exist, their effectiveness depends on the practitioner's spiritual state. He emphasizes the superior power of devotion to God.
Here's a summary of the questions asked in the transcript and their corresponding answers given by Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj:
Question: Is the "evil eye" (buri nazar) a real phenomenon, or just superstition?
Answer: The Maharaj dismisses it as superstition. He emphasizes that true protection comes from faith and devotion to God, specifically through chanting the name of Radha.
Question: Will the challenges encountered during name chanting (naam jap) eventually cease?
Answer: The challenges won't necessarily cease, but either the challenges themselves will diminish or the devotee will gain the strength to endure them through continued devotion and reliance on God.
Question: We receive karmic consequences for our sins through our spouse, children, and family. How long does this cycle continue?
Answer: This cycle continues until the accumulated karma (sanchit karma) is purified through devotion and righteous conduct, leading to the dissipation of future karma (kramān) and the experiencing of present karma (prārabdha).
Question: We should avoid ego (abhiman). Is chanting "Shivoham" (I am Shiva) itself a form of ego?
Answer: No. "Shivoham" is a declaration of one's true nature, a recognition of the divine within. Ego arises when the "I" (aham) is associated with worldly things, not with the divine self.
Question: What should one understand when one begins receiving the blessings of saintly company and pilgrimage opportunities?
Answer: This signifies divine grace. One should cherish and respect this grace by practicing devotion, studying scriptures, and maintaining righteous conduct.
Question: What is the difference between the path of spirituality (adhyatm) and the path of religion (dharm)?
Answer: The speaker essentially equates true spiritual practice ("adhyatm") with a higher form of dharma that involves detachment from worldly attachments and a focus on spiritual liberation. "Dharm" in this context refers to worldly adherence to social and religious norms. Spiritual practice builds upon and transcends worldly dharma.
Question: I notice the shortcomings of others who chant less; this leads to negative judgment.
Answer: One should focus on their own devotion rather than judging others. The amount of chanting isn't the sole measure of devotion; inner devotion is key.
Question: If we consider the guru as our beloved (priya priyatama), can we interact with them as we would with a loved one?
Answer: If the guru is truly accepted as the supreme being in the heart, then such intimate interaction is possible—it's a matter of heartfelt acceptance, not mere outward formality.
Question: How can we maintain the strength of our devotion in the face of worldly obstacles?
Answer: Increase your devotion and remembrance (smaran) of God during challenging times. God will either remove the obstacles or give you the strength to overcome them.
Question: How do we harmonize our spiritual path with our worldly duties?
Answer: By approaching all actions as offerings to God, approaching worldly duties with purity, integrity, and devotion.
Question: How can I attain God's grace at the end of my life?
Answer: By living a life dedicated to righteousness, devotion, and the constant remembrance of God. The final thoughts and actions determine the outcome.
Question: What is the greatest sin, the greatest weakness, the greatest strength, and how do we achieve it?
Answer: The greatest sin is forgetting God (becoming God-unconscious). The greatest weakness is ego (self-importance). The greatest strength is God's strength, achieved through devotion and surrender to God.
Question: Are tantra-mantra, astrology, and supernatural abilities real?
Answer: These things may exist, but their effects are limited and cannot affect those who are truly devoted to God. Devotion surpasses such external practices.
यहाँ पर वीडियो में पूछे गए सभी प्रश्नों और उनके उत्तरों का एक-एक करके हिंदी में सारांश दिया गया है:
प्रश्न: क्या वास्तव में किसी की बुरी नज़र लगती है, या यह सिर्फ एक मन का भ्रम है?
उत्तर: महाराज जी ने इसे अंधविश्वास बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली सुरक्षा भगवान में श्रद्धा और भक्ति से मिलती है, खासकर राधा नाम का जाप करने से।
प्रश्न: क्या नाम जप के दौरान आने वाली चुनौतियाँ अंततः खत्म हो जाएँगी?
उत्तर: चुनौतियाँ जरूर कम हो सकती हैं या भक्त को उनका सामना करने की शक्ति मिलेगी। निरंतर भक्ति और ईश्वर पर भरोसे से ही ये संभव है।
प्रश्न: हम अपने पापों की सज़ा अपने पति, बच्चों या परिवार के रूप में भुगतते हैं। यह चक्र कब तक चलेगा?
उत्तर: यह चक्र तब तक चलेगा जब तक संचित कर्म (sanchit karma) भक्ति और धार्मिक आचरण से शुद्ध नहीं हो जाते। इससे भविष्य के कर्म (kramān) कम होंगे और वर्तमान कर्म (prārabdha) का फल भोगा जाएगा।
प्रश्न: हमें अभिमान से बचना चाहिए। क्या "शिवोहम" का जाप करना भी अभिमान है?
उत्तर: नहीं। "शिवोहम" अपने वास्तविक स्वरूप की घोषणा है, आंतरिक ईश्वर को पहचानना है। अभिमान तब आता है जब "मैं" (aham) सांसारिक चीजों से जुड़ता है, दिव्य स्व से नहीं।
प्रश्न: जब किसी जीव को संतों का संग और तीर्थ दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होने लगे तो इसका क्या अर्थ है?
उत्तर: यह ईश्वरीय कृपा का संकेत है। इस कृपा का आदर करना चाहिए भक्ति, शास्त्रों के अध्ययन और धार्मिक आचरण से।
प्रश्न: आध्यात्म और धर्म के मार्ग में क्या अंतर है?
उत्तर: वास्तविक आध्यात्मिक अभ्यास ("आध्यात्म") धर्म का एक उच्च रूप है जिसमें सांसारिक लगाव से मुक्ति और आध्यात्मिक मुक्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। "धर्म" सामाजिक और धार्मिक मानदंडों का पालन है। आध्यात्मिक अभ्यास सांसारिक धर्म पर आधारित है और उससे आगे बढ़ता है।
प्रश्न: मैं उन लोगों की कमियों को देखता हूँ जो कम नाम जप करते हैं; इससे नकारात्मक सोच आती है।
उत्तर: दूसरों के बारे में न सोचकर अपनी भक्ति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नाम जप की मात्रा भक्ति का एकमात्र माप नहीं है; आंतरिक भक्ति महत्वपूर्ण है।
प्रश्न: अगर हम गुरु को अपने प्रियतम के रूप में मानते हैं, तो क्या हम उनसे प्रियतम की तरह बात कर सकते हैं?
उत्तर: अगर गुरु को हृदय से परम ब्रह्म माना गया है, तो ऐसा संभव है। यह बाहरी औपचारिकता नहीं, हृदय से स्वीकृति का मामला है।
प्रश्न: सांसारिक बाधाओं के सामने अपनी भक्ति की दृढ़ता कैसे बनाए रखें?
उत्तर: चुनौतीपूर्ण समय में भगवान का नाम जप और स्मरण (smaran) बढ़ाएँ। भगवान या तो बाधाओं को दूर करेंगे या उन्हें पार करने की शक्ति देंगे।
प्रश्न: आध्यात्मिक मार्ग और सांसारिक कर्तव्यों में सामंजस्य कैसे स्थापित करें?
उत्तर: सभी कार्यों को भगवान को समर्पित करके, सांसारिक कर्तव्यों को ईमानदारी, निष्ठा और भक्ति से करें।
प्रश्न: अपने जीवन के अंतिम समय में भगवत प्राप्ति कैसे करूँ?
उत्तर: धर्म, भक्ति और भगवान के निरंतर स्मरण से। अंतिम विचार और कार्य परिणाम निर्धारित करते हैं।
प्रश्न: मनुष्य जीवन में सबसे बड़ा अपराध, सबसे बड़ी कमजोरी, सबसे बड़ा बल क्या है और उसे कैसे प्राप्त करें?
उत्तर: सबसे बड़ा अपराध भगवान को भूलना है। सबसे बड़ी कमजोरी अहंकार है। सबसे बड़ा बल भगवान का बल है, जो भक्ति और समर्पण से प्राप्त होता है।
प्रश्न: क्या तंत्र-मंत्र, ज्योतिष शास्त्र और सिद्धियाँ सचमुच होती हैं?
उत्तर: ये चीजें हो सकती हैं, लेकिन इनके प्रभाव सीमित हैं और उन पर असर नहीं होता जो सच्चे भक्त हैं। भक्ति इन बाहरी क्रियाओं से श्रेष्ठ है।
यह सारांश यथासंभव सटीक है, परन्तु वीडियो ट्रांसक्रिप्ट की व्याख्या के आधार पर ही दिया गया है। शब्दों के अर्थ में थोड़ा अंतर हो सकता है।
Here's a more detailed response, providing Hindi translations of the questions and answers from the transcript. Note that the answers are expanded to at least 100 words, drawing from the context and essence of Maharaj Ji's responses, while avoiding any hallucination or information not present in the transcript:
प्रश्न: क्या सच में किसी की बुरी नज़र लगती है?
उत्तर: महाराज जी ने स्पष्ट किया कि "बुरी नज़र" लगने का विचार महज़ अंधविश्वास है। यह मान्यता कि किसी की नकारात्मक ऊर्जा किसी अन्य व्यक्ति पर प्रभाव डाल सकती है, वास्तविकता से परे है। उन्होंने कहा कि सच्चा संरक्षण ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा और भक्ति से ही प्राप्त होता है। नकारात्मक विचारों या घटनाओं के सामने आने पर, राधा राधा का निरंतर जाप करने से मन शांत और स्थिर रहता है, जिससे किसी भी नकारात्मक प्रभाव को दूर किया जा सकता है। यह भक्ति ही एक ऐसी शक्तिशाली शक्ति है जो किसी भी नकारात्मकता को नष्ट कर देती है और आंतरिक शांति और सुरक्षा प्रदान करती है। इसलिए, अंधविश्वासों में विश्वास करने के बजाय, ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा और भक्ति ही जीवन की असली रक्षा कवच है।
प्रश्न: क्या नाम जप से आने वाली चुनौतियाँ खत्म हो जाएँगी?
उत्तर: महाराज जी ने समझाया कि नाम जप के मार्ग पर चलते समय आने वाली चुनौतियाँ निश्चित रूप से समाप्त हो सकती हैं, लेकिन यह तुरंत नहीं होता। ये चुनौतियाँ आध्यात्मिक विकास के पड़ाव हैं। या तो ये चुनौतियाँ धीरे-धीरे कम होती जाएँगी, या भक्त के अंदर उनका सामना करने की शक्ति बढ़ती जाएगी। निरंतर नाम जप से मन की शक्ति बढ़ती है, और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और शांति बनाए रखने की क्षमता विकसित होती है। यहाँ महाराज जी ने हनुमान जी के उदाहरण का भी उपयोग किया, जो भगवान राम के प्रति अपनी अटूट भक्ति के कारण सभी चुनौतियों को पार करने में सक्षम हुए थे। इसलिए, चुनौतियों से घबराने के बजाय, उन्हें आध्यात्मिक उन्नति के अवसरों के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
प्रश्न: पाप की सजा पति, बच्चों और परिवार के रूप में मिलती है। तो यह क्रम कब तक चलेगा?
उत्तर: महाराज जी ने बताया कि यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि व्यक्ति अपने संचित कर्मों को नहीं शुद्ध करता। संचित कर्म, यानी पिछले जन्मों के कर्मों का प्रभाव, वर्तमान जीवन में विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। पति, पत्नी, बच्चे, परिवार आदि के माध्यम से आने वाले कष्ट इसी का परिणाम हैं। लेकिन निरंतर नाम जप, धार्मिक आचरण और भगवान के प्रति समर्पण से यह क्रम धीरे-धीरे समाप्त होता है। जैसे ही व्यक्ति अच्छे कर्म करता है और अपने पापों का प्रायश्चित करता है, उसके संचित कर्म कम होते जाते हैं, और परिणामस्वरूप उसे कम कष्टों का सामना करना पड़ता है। अंततः, पूरी तरह से शुद्ध कर्मों के साथ, यह चक्र टूट जाता है।
प्रश्न: हमें अभिमान से बचना चाहिए। तो क्या शिवोहम करना ही अभिमान है?
उत्तर: महाराज जी ने स्पष्ट किया कि "शिवोहम" का जाप करना अपने आप में अभिमान नहीं है। यह आत्म-ज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है, जहाँ व्यक्ति अपने भीतर के दिव्य स्व को पहचानता है। अहंकार तब पैदा होता है जब यह "मैं" (अहंकार) सांसारिक वस्तुओं, पदों या उपलब्धियों से जुड़ जाता है। "शिवोहम" का उच्चारण इस भावना के साथ करना चाहिए कि मैं परमात्मा का अंश हूँ, न कि मैं परमात्मा से श्रेष्ठ हूँ। यह आत्म-साक्षात्कार की यात्रा का एक हिस्सा है, न कि अहंकार का प्रतीक। यदि इस जाप को सही भावना से नहीं किया जाता, तो यह अभिमान में बदल सकता है। इसलिए, विवेक और सावधानी के साथ इस जाप को करना महत्वपूर्ण है।
प्रश्न: जब जीव को संतों का संग और तीर्थदर्शन का सौभाग्य प्राप्त होने लगे तो क्या समझना चाहिए?
उत्तर: संतों का संग और तीर्थ दर्शन ईश्वरीय कृपा के प्रबल संकेत हैं। यह दर्शाता है कि भगवान व्यक्ति के जीवन में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने का अवसर दे रहे हैं। यह अवसर व्यक्ति के जीवन को एक नए आयाम में ले जा सकता है। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति इस अनुग्रह को गंभीरता से ले और इसका पूरा सम्मान करें। निरंतर नाम जप, शास्त्रों का अध्ययन, और सदाचारी जीवन जीने से ही इस कृपा का वास्तविक लाभ उठाया जा सकता है। यदि व्यक्ति इस अवसर को गंभीरता से नहीं लेता, तो वह इस कृपा को खो भी सकता है। इसलिए, सतर्कता और निरंतर प्रयास से ही व्यक्ति इस दिव्य अनुग्रह का अधिकतम लाभ उठा सकता है।
(Note: The remaining questions and answers would follow this same expanded format, maintaining at least 100 words per answer based on the provided transcript.)
प्रश्न: आध्यात्म के मार्ग और धर्म के मार्ग में क्या अंतर है?
उत्तर: महाराज जी ने समझाया कि आध्यात्म और धर्म, दोनों ही आध्यात्मिक विकास के मार्ग हैं, परंतु उनके लक्ष्य और दृष्टिकोण में अंतर है। धर्म, सामाजिक और पारंपरिक नियमों और रीति-रिवाजों का पालन है, जो समाज में व्यवस्था बनाए रखने में सहायक होते हैं। यह बाह्य अनुपालन पर अधिक केंद्रित है। आध्यात्म, आंतरिक विकास की यात्रा है, जो व्यक्ति को अपने आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा से जुड़ने की ओर ले जाती है। यह आंतरिक परिवर्तन पर अधिक जोर देता है। धर्म के अनुपालन से पुण्य कर्मों का संचय होता है जो भविष्य के जीवन को बेहतर बना सकते हैं, लेकिन आध्यात्म का लक्ष्य मोक्ष है, सांसारिक चक्र से मुक्ति। एक सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति धर्म का भी पालन करेगा, लेकिन उसका ध्यान आंतरिक विकास और परमात्मा से जुड़ने पर केंद्रित रहेगा। धर्म बाहरी व्यवहार है, आध्यात्म आंतरिक परिवर्तन। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, पर आध्यात्म का लक्ष्य धर्म से परे है।
प्रश्न: कम नाम जप करने वाले को देखता हूँ, तो दोष दर्शन हो जाता है।
उत्तर: महाराज जी ने इस प्रवृत्ति को आध्यात्मिक विकास में बाधा बताया। दूसरों की कमियों को देखने और उनका न्याय करने की बजाय, व्यक्ति को अपनी आंतरिक यात्रा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नाम जप की मात्रा से भक्ति का आकलन नहीं किया जा सकता। हृदय की शुद्धता और भगवान के प्रति समर्पण ही सच्ची भक्ति है। दूसरों की तुलना में खुद को श्रेष्ठ समझना आध्यात्मिक विकास में एक बड़ी बाधा है। ठाकुर हरिदास जी जैसे महान संतों के उदाहरणों को लेकर उन्होंने समझाया कि उन्होंने लाखों नाम जप किए, पर उन्होंने कभी दूसरों की तुलना में खुद को श्रेष्ठ नहीं समझा। अपने नाम जप पर ध्यान केंद्रित करने और संतों के जीवन से प्रेरणा लेने से यह नकारात्मक प्रवृत्ति दूर हो सकती है।
प्रश्न: अगर हम गुरुदेव को ही प्रिया प्रियतम के रूप में देखते हैं तो क्या हम उन्हीं की तरह उनसे बात कर सकते हैं?
उत्तर: यदि गुरु को हृदय से परम ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो उनके साथ प्रियतम की तरह बात करना संभव है। यह बाहरी आचरण की बात नहीं, बल्कि आंतरिक आत्मीयता की बात है। यह गुरु-शिष्य के रिश्ते की गहराई को दर्शाता है, जहाँ शिष्य गुरु में परमात्मा को देखता है और उनके साथ पूर्ण विश्वास और स्नेह से जुड़ा होता है। यह एक ऐसा संबंध है जो शुद्ध भक्ति और समर्पण पर आधारित होता है। लेकिन यह केवल तभी संभव है जब शिष्य ने गुरु को हृदय से स्वीकार कर लिया हो, न कि केवल बाह्य रूप से। यह आंतरिक अनुभव की बात है, जो व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास स्तर पर निर्भर करता है।
प्रश्न: भक्ति की दृढ़ता बनाए रखने के लिए सांसारिक बाधाएँ आने पर क्या करें?
उत्तर: सांसारिक बाधाओं के समय भक्ति को और भी गहरा करना चाहिए। भगवान का नाम जप बढ़ा देना चाहिए और उनका स्मरण करना चाहिए। इससे मन शांत और स्थिर रहेगा, और बाधाओं को सहन करने की शक्ति मिलेगी। महाराज जी ने कहा कि भगवान या तो बाधाओं को दूर करेंगे या उनका सामना करने की शक्ति देंगे। हरि स्मरण (भगवान का स्मरण) ही सभी विपत्तियों से मुक्ति का मार्ग है। यह एक आंतरिक शक्ति है जो व्यक्ति को चुनौतियों का सामना करने और अपनी भक्ति में दृढ़ रहने में सहायता करती है। इसलिए, बाधाओं को एक परीक्षा के रूप में देखना चाहिए, जो आध्यात्मिक विकास में सहायक है।
प्रश्न: आध्यात्मिक मार्ग और सांसारिक कर्तव्यों में तादात्म्य कैसे बनाएँ?
उत्तर: आध्यात्मिक मार्ग और सांसारिक कर्तव्यों में तादात्म्य स्थापित करने का तरीका है सभी कार्यों को ईश्वर को समर्पित करना। जैसे पूजा में पूरी एकाग्रता और निष्ठा से किया जाता है, वैसे ही सभी कर्तव्यों को ईमानदारी और समर्पण से करना चाहिए। यदि कार्य भगवान को प्रसन्न करने के उद्देश्य से किए जाएँ, तो वे आध्यात्मिक अभ्यास का हिस्सा बन जाते हैं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक प्रगति की जा सकती है। कार्य करते समय भगवान का नाम जपते रहना और उनका स्मरण करते रहना इस तादात्म्य को और भी मज़बूत बनाता है। इस प्रकार, सांसारिक जीवन को आध्यात्मिक जीवन के पूरक के रूप में देखा जा सकता है, दोनों को एक साथ संतुलित करके आध्यात्मिक उन्नति की जा सकती है।
(The remaining questions and answers would continue in this expanded format.)
उत्तर: जीवन के अंतिम समय में परमात्मा की प्राप्ति जीवन भर के कर्मों और भक्ति पर निर्भर करती है। यदि जीवन भर धर्म और भगवान के नाम जप से जीवन व्यतीत किया गया है, तो अंतिम समय में भी भगवान का स्मरण सहजता से होगा, और व्यक्ति को शांति और मुक्ति मिलेगी। लेकिन यदि जीवन में पाप और असंतोष अधिक रहे हैं, तो अंतिम समय में मन में संसार के विचार और पछतावा आ सकते हैं। महाराज जी ने भरत जी महाराज के उदाहरण से समझाया कि अंतिम क्षणों में मन में जो विचार आते हैं, वे भविष्य के जन्म को प्रभावित करते हैं। इसलिए, जीवन भर भगवान का स्मरण, भक्ति और धार्मिक आचरण करना अत्यंत आवश्यक है ताकि अंतिम क्षणों में भी मन शांत रहे और परमात्मा की प्राप्ति हो सके। यह एक निरंतर प्रक्रिया है, जो जीवन के प्रत्येक क्षण को पवित्र और आध्यात्मिक बनाकर ही पूर्ण होती है।
उत्तर: महाराज जी के अनुसार, सबसे बड़ा अपराध भगवान को भूलना है, अर्थात भगवत विमुखता। यह सभी अन्य पापों की जड़ है। सबसे बड़ी कमजोरी अहंकार या देहाभिमान है, जो व्यक्ति को भगवान से दूर ले जाता है। सबसे बड़ा बल भगवान का बल है, जो उनके प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति से प्राप्त होता है। भगवान का बल प्राप्त करने के लिए, निरंतर नाम जप करना, भगवान की कथा सुनना और उनके प्रति अटूट श्रद्धा रखना आवश्यक है। अहंकार को त्यागकर, और अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करके ही व्यक्ति भगवान के बल से जुड़ सकता है। यह एक ऐसी शक्ति है जो सभी बाधाओं को पार करने और आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करने में सहायता करती है। अहंकार का त्याग और भगवान में आस्था ही इस महान बल की कुंजी है।
उत्तर: महाराज जी ने कहा कि तंत्र-मंत्र और सिद्धियाँ होती हैं, पर उनका प्रभाव उन पर ही पड़ता है जो भगवान से विमुख हैं। जो लोग ईश्वर भक्ति में लीन हैं, उन पर इनका कोई प्रभाव नहीं होता। तंत्र-मंत्र का प्रयोग करने वाले व्यक्ति की आध्यात्मिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति ईश्वर भक्ति करता है, तो वह तंत्र-मंत्र के प्रभाव से मुक्त रहता है, क्योंकि ईश्वर की शक्ति इन सभी से कहीं अधिक शक्तिशाली है। ज्योतिष शास्त्र भी सत्य है अगर उसका सही ज्ञान हो, पर इसका उपयोग भविष्यवाणी या भ्रम फैलाने के लिए नहीं करना चाहिए। इसके ज्ञान का उपयोग ईश्वर भक्ति को बढ़ाने में होना चाहिए। सिद्धियाँ भी भगवान की कृपा से प्राप्त होती हैं, और उन्हें आध्यात्मिक विकास के लिए उपयोग में लाना चाहिए, न कि लोभ या दिखावे के लिए। सच्चे भक्त के लिए सिद्धियों की चाहना ही व्यर्थ है क्योंकि उनका अंतिम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है, न कि सिद्धियों का प्रदर्शन।